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भारतीय गायो की प्रजातिया (Cow Breeds in India)

हमारा देश, कुल दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में पिछले एक दशक से प्रथम स्थान पर है। प्राचीन काल से हमारे किसान कृषि के साथ-साथ पशुपालन करते आ रहे है। गोपशुओ के स्वास्थ्य एवं संख्या से ही किसानो की समपन्नता का मूल्यांकन आँका जाता रहा है। हिन्दू धार्मिक दृष्टि से गाय पवित्र मानी जाती रही है। गाय से प्राप्त दूध, घी, झरण आदि आरोग्य व प्रसन्नता के ईश्वरीय वरदान हैं। मानव गौ की महिमा को समझकर उससे प्राप्त दूध, दही आदि पंचगव्यों का लाभ ले तथा अपने जीवन को स्वस्थ, सुखी बनाये – इस उद्देश्य से हमारे ऋषियों-महापुरुषों ने गौ को माता का दर्जा दिया था। गौ-सेवा से धन-सम्पत्ति, आरोग्य आदि मनुष्य-जीवन को सुखकर बनानेवाले सम्पूर्ण साधन सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।

2012 के 19 वीं पशुगणना के अनुसार गोवंश की जनसंख्या लगभग 19 करोड़ है। आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर इन्हें 3 भागों में विभाजित किया गया है।

दुधारू नस्ल – अच्छा दूध देने वाली लेकिन उसकी संतान खेती के कार्यो में अनुपयोगी दुधारू बोझ ढोने?ऽ

बोझ ढोने वाली नस्ल – दूध कम देती है लेकिन उसकी संतान कृषि कार्य के लिए उपयोगी

दुधारू और बोझ ढोने वाली नस्ल- अच्छा दूध देने वाली और संतान खेती के कार्य में उपयोगी

भारत में गाय की लगभग 40 नस्लें पाई जाती हैं।  आईए जानते है भारतीय गायो की प्रजातियों के बारे में-

साहिवाल गाय- पुंजब और राजस्थान में पाई जाती हैं। यह गाय लाल और गहरे भूरे रंग की होती है, चमड़ी ढीली, छोटा सिर व सींग इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। इसका शरीर साधारणतः लंबा और मांसल होता है। इनकी टाँगे छोटी होती है, स्वभाव कुछ आलसी और तथा इसकी खाल चिकनी होती है। पूंछ पतली और छोटी होती है। नर साहिवाल के पीठ पर बड़ा कूबड़ होता है। नर गाय का वजन 450 से 500 किलो और मादा गाय का वजन 300-400 किलो तक होता है। यह गाय 10 से 16 लीटर तक दूध देने कि क्षमता रखती है। साथ ही इसके दूध में पर्याप्त वसा होता है। साहीवाल की खूबियों और उसके दूध की गुणवत्ता के चलते वैज्ञानिक इसे सबसे अच्छी देसी दुग्ध उत्पादक गाय मानते हैं। डेरी किसानो को इससे पालने में बहोत फायदा होता है।

रेड सिंधी- मुख्यतः पुंजाब और राजस्थान में पाई जाती हैं। इसका रंग लाल बादामी होता है। आकर में साहिवाल से मिलती जुलती होती है। ये दूसरी जलवायु में भी रह सकती हैं तथा इनमें रोगों से लड़ने की अद्भुत शक्ति होती है। इसके सिंग जड़ों के पास से काफी मोटे होते है। शरीर की तुलना में इसके कुबड बड़े आकर के होते है। इसमें रोगों से लड़ने की अदभुत क्षमता होती है। इसका वजन औसतन 350 किलोग्राम तक होता है। संतान उत्पत्ति के 300 दिनों के भीतर ये 200 लीटर दूध देती है।

थरपारकर- या सफेद सिंधी, कची और थारी के नाम से जानी जाने यह गाय सिंध प्रांत के थारपरकर जिले में पैदा होने वाली नस्ल है। यह दुग्ध और भार धोने की क्षमता के लिए जानी जाती है एक दोहरी उद्देश्य नस्ल है। ये गायें दुधारू होती हैं और इनका रंग खाकी, भूरा, या सफेद होता है। इनकी खुराक कम होती है।

गीर- गुजरात में पाई जाने वाली दुधारू नसल की गाय है। इनका मूलस्थान काठियावाड़ का गीर जंगल है। इनका मस्तक उन्न्तोद्दर ;बवदअमगद्ध होता है, कान लंबे और गले की ओर झुके रहते हैं। सींग खूंतीदार और बीच से मुड़े होते हैं। इनके पावं काले और बहुत सखत होते हैं। त्वचा पर छोटे छोटे बाल होते हैं। यह काफी शांत स्वाभाव की गईं है। गीर प्रतिदिन ५०-८० लीटर दूध देती हैं।

हरियाना- मुख्यतः हरियाना में पाई जाने वाली ये गायों का रंग सफेद, मोतिया या हल्का भूरा होता हैं ये ऊँचे कद और गठीले बदन की होती हैं तथा सिर उठाकर चलती हैं। भारत की पांच सबसे श्रेष्ठ नस्लो में हरयाणवी नस्ल आती है। ये ८-१२ लीटर दूध प्रतिदिन देती हैं।

अंगोल या नीलोर- का जन्म स्थान तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश है। ये दुधारू गाएँ सुंदर होती हैं और ये चारा भी कम खाती हैं।

राठी- राजस्थान के अलवर की गाएँ हैं। राठी पशु की त्वचा भूरा व सफेद या काला व सफेद रंगों का मिश्रण होती है और अत्यन्त आकर्षक लगती है। कम खाने और अत्यधिक दूध देने के लिये इस नस्ल की गाय प्रसिद्ध है। वयस्क राठी गाय का वजन लगभग 280 – 300 किलोग्राम और बैल का 350-350 किलोग्राम होता है। यह गाय प्रतिदन 6 -8 लीटर दूध देती है।

काँकरेज- गुजरात और राजस्थान की ये सर्वांगी जाति की गाए हैं और इनकी माँग विदेशों में भी है। इनका रंग रुपहला भूरा, लोहिया भूरा या काला होता है। टाँगों में काले चिह्न तथा खुरों के ऊपरी भाग काले होते हैं। ये सिर उठाकर लंबे और सम कदम रखती हैं। चलते समय इनकी चाल अटपटी मालूम पड़ती है।

मालवी- मध्यप्रदेश में पाई जाने वाली ये गायें दुधारू नहीं होतीं। इनका रंग खाकी होता है तथा गर्दन कुछ काली होती है। अवस्था बढ़ने पर रंग सफेद हो जाता है।

नागौरी- राजस्थान में पाई जाने वाली ये गायें दुधारू नहीं होतीं, किंतु ब्याने के बाद बहुत दिनों तक थोड़ा-थोड़ा दूध देती रहती हैं।

पवाँर- उत्तर प्रदेश में पाई जाने वाली ये गाये का मुँह सँकरा और सींग सीधी तथा लंबी होती है। पूँछ लंबी होती है और ये स्वभाव से क्रोधी होती है। ये गाये दूध कम देती हैं।

भगनाड़ी- बलूचिस्तान प्रांत के भाग क्षेत्र कीये गायें खूब दूध देती हैं। ज्वार इनका प्रिय भोजन है। 13ण् देवनी- दक्षिण आंध्र प्रदेश और हिंसोल में पाई जाती हैं। ये दूध खूब देती है।

नीमाड़ी – मध्यप्रदेश के नर्मदा नदी की घाटी इनका प्राप्तिस्थान है। ये गाएँ दुधारू होती हैं।

कृष्णा वैल्ली- भारत में उत्तरी कर्नाटक क्षेत्र के मूल नसल हैं। मुख्य रूप से ये बोझ ढोने वाली नस्ल है। बैल ताकत और धीरज के लिए जाना जाता है और गांए मध्यम दूध देती हैं।1

अमृतमहल- कर्नाटक में मैसूर में पाई जाने वाली गायें है। बैल उनके ,धीरज और गति के लिए उल्लेखनीय हैं उनके सिर के बीच में एक रिज के साथ लम्बी और एक उभड़ा हुआ माथा है। गांय से कम दूध प्राप्त होता है इसलिए उन्हें बोझ ढोने वाली नस्ल के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

हल्लीकर- कर्नाटक में पाई जाने वाली गायें लम्बी, ऊर्ध्वाधर और पिछड़े झुकने वाले सींग, पुरुषों में बड़े कूबड़, सफेद से भूरे और कभी-कभी काला रंग नस्ल की विशेषताएं हैं। मुख्य रूप से ये बोझ ढोने वाली नस्ल है। बैल अपनी ताकत और धीरज के लिए जाना जाता है।

इसके इलावा बिहार की बछौर, तमिलनाडु की कंगायम, बरगुर, महाराष्ट्रा और मध्यप्रदेश की गओलओ, डांगी, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की केन्कथा, उत्तर प्रदेश की खेरीगढ़, महाराष्ट्रा और कर्नाटक की खिल्लारी, कुछ अन्य गाएँ हैं।

दोस्तों उमीद है भारतीय गायो की प्रजातियों पर हमारा टपकमव आपको जरुर पसंद आया होगा।